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दानवीर कर्ण

दानवीर कर्ण कर्ण कुंती का पुत्र था| पाण्डु के साथ कुंती का विवाह होने से पहले ही इसका जन्म हो चुका था| लोक-लज्जा के कारण उसने यह भेद किसी को नहीं बताया और चुपचाप एक पिटारी में रखकर उस शिशु को अश्व नाम की नदी में फेंक दिया था| इसके जन्म की कथा बड़ी विचित्र है| राजा कुंतिभोज ने कुंती को पाल-पोसकर बड़ा किया था| राजा के यहां एक बार महर्षि दुर्वासा आए| कुंती से उनका बड़ा सत्कार किया और जब तक वे ठहरे, उन्हीं की सेवा-सूश्रुषा में रही| इसकी इस श्रद्धा-भक्ति से प्रसन्न होकर महर्षि ने उसे वार दिया कि वह जिस देवता को मंत्र पढ़कर बुलाएगी वही आ जाएगा और उसको संतान भी प्रदान करेगा| कुंती ने नादानी के कारण महर्षि के वरदान की परीक्षा लेने के लिए सूर्य नारायण का आवाहन किया| बीएस उसी क्षण सूर्यदेव वहां आ गए| उन्हीं के सहवास के कारण कुंती के गर्भ से कर्ण का जन्म हुआ| जब पिटारी में रखकर इस शिशु को उसने फेंक दिया, तो वह पिटारी बहती हुई आगे पहुंची| वहां अधिरथ ने कौतूहलवश उसे उठा लिया और खोलकर देख तो उसमें एक जीवित शिशु देखकर वह आश्चर्य करने लगा| अधिरथ उस शिशु की निरीह अवस्था पर करुणा करके उसे अपने घर ले आया...

भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रेरणादायक कथा

परिचय: भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की यह कथा हमें जीवन में सही निर्णय लेने, अपने वचनों का पालन करने और दूसरों के साथ अच्छाई से पेश आने की शिक्षा देती है। इस कथा में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के बीच एक महत्वपूर्ण संवाद है, जो अंततः माता लक्ष्मी के लिए एक बड़ी सीख और वरदान का कारण बनता है। भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की यात्रा: एक दिन भगवान विष्णु शेषनाग पर आराम कर रहे थे और उन्हें धरती पर घूमने का विचार आया। बहुत समय से वे धरती पर नहीं गए थे। भगवान विष्णु अपनी यात्रा की तैयारी कर रहे थे, तभी माता लक्ष्मी ने उनसे पूछा, “हे देव, आप कहां जा रहे हैं?” भगवान विष्णु ने कहा, “हे लक्ष्मी, मैं धरती पर घूमने जा रहा हूं।” लक्ष्मी मां ने थोड़ी देर सोचने के बाद कहा, “क्या मैं भी आपके साथ चल सकती हूं?” भगवान विष्णु ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “तुम मेरे साथ जा सकती हो, लेकिन एक शर्त है। तुम धरती पर पहुंचकर उत्तर दिशा की ओर बिल्कुल भी नहीं देखना।” माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु की बात मान ली और वे दोनों धरती पर पहुंच गए। उस समय सूर्योदय हो रहा था और धरती पर हरियाली और शांति छाई हुई थी। माता लक्ष्म...

अर्जुन की प्रतिज्ञा: महाभारत की एक प्रेरक कथा

परिचय: महाभारत के युद्ध में, जहां हर पल का संघर्ष कौरव और पाण्डवों के बीच जीवन और मृत्यु के बीच जूझ रहा था, एक ऐसी घटना घटी, जिसने अर्जुन के साहस और बलिदान को उजागर किया। यह घटना थी अर्जुन की प्रतिज्ञा, जो उसने अपने पुत्र अभिमन्यु की मृत्यु के बाद ली थी। आइए जानते हैं, कैसे अर्जुन ने अपनी प्रतिज्ञा पूरी की और जयद्रथ का वध किया। अभिमन्यु की वीरगति: महाभारत का युद्ध अपने चरम पर था। द्रोणाचार्य ने पाण्डवों को पराजित करने के लिए चक्रव्यूह का निर्माण किया। अर्जुन की अनुपस्थिति में, उनके पुत्र अभिमन्यु ने इस चक्रव्यूह को भेदने का प्रयास किया। वह कुशलता से छः चरणों को पार कर गए, लेकिन सातवें चरण में उन्हें घेर लिया गया। जयद्रथ, दुर्योधन और अन्य महारथियों ने अभिमन्यु पर हमला किया। आखिरकार, अभिमन्यु निहत्थे होकर वीरगति को प्राप्त हो गए। अर्जुन की प्रतिज्ञा: अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार सुनकर अर्जुन ने क्रोध और दुख से भरकर एक अडिग प्रतिज्ञा ली। उन्होंने कहा, “यदि मैंने अगले दिन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध नहीं किया, तो मैं आत्मदाह कर लूंगा।” यह सुनकर जयद्रथ डर गया और वह दुर्योधन के पास गया और...